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2007-06-26

दर्द की ख्वाहिश

औफ़िस की सरहदों में चुपचाप बैठा, काम करता एक मनुष्य | अपने काम से जूझता हुआ; अपने आप से पूछता हुआ;
किस दर्द की ख्वाहिश है मुझे?
क्यों इस अजनबी शहर में अपनी इन्सिग्निफिकन्स को सह रहा हूँ ?
क्या जिन दिनों की मीठी यादों को सोच आँखें छलक सी जाती हैं, वो दिन सही में इतने अछ्छे थे ?
क्या ऐसा भी दिन आयेगा , जब ये ड॓डलाइन्स मेरे काबू में होंगी?
क्यों अपनी प्रौब्लम्स इस पब्लिक फोरम में उछाल रहा हूँ? क्या मिल रहा है ? क्या जीवन के ठहराव से बचने के लिए ये ऐबरेशन रच रहा हूँ?
:)
शायद हाँ; शायद यही मेरी दर्द कि ख्वाहिश है |

-विनीत

1 comment:

Mahima said...

yeh kab likha....wow.. :| i m ur biggest fan

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