मेरी अठखेलियाँ मेरा स्वभाव था
उतावलेपन में नहीं ठहराव था
मेरी लौ में जलते नेत्र नहीं हैं अब
मेरा रिक्त हो जाना ही तो सही है अब
जब मेरे मोम के शरीर को गंगा में तिराना तुम
तनिक अफ़सोस नहीं करना, आंसू न बहाना तुम
खुशबुओं से तृप्त मोम के टुकड़े और मिलेंगे
मेरी जर्जरता से रिक्त सूर्यांश और मिलेंगे
चलता हूँ मुसाफिर हूँ बड़ी दूर है जाना
एक बुझती लौ अपने नाम किए जाता हूँ
कभी वक्त मिले ग़र , मेरे देस भी आना
तेरे देस की यादें मैं साथ लिए जाता हूँ

1 comment:
arre chacha itna dard kyon ??
fir bhi gazab likha hai..
barabar likhte rahiye aisi achhi kritiyaan..shubhkaamnaein
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